हिन्दू नव वर्ष के नये संकल्प
कमल चन्द्रा
विश्वभर में नववर्ष का स्वागत पूरे जोश के साथ किया जाता है। हमारे देश में हम हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र माह से नववर्ष मनाते हैं। अंग्रेजी नववर्ष 1 जनवरी में मनाया जाता है तो वहीं इस्लामिक नववर्ष मोहर्रम की माह की पहनी तारीख से प्रारंभ होते है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में सूर्य, चन्द्रमा, और तारों की गति नववर्ष कैलेंडर प्रणालियां निश्चित होती हैं यहां नववर्ष के दिन, तिथि, प्रकार, मान्यतायें भी सम्प्रदायों के अनुरूप भिन्न भिन्न होती हैं। इतनी सारी भिन्नताओं के बावजूद भी मूलमंत्र यही है कि हम सभी धर्म के लोग आदि से अंत तक शुभमंगल ही चाहते है। अतः नववर्ष के उत्सव को हम अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारें तो पायेंगे कि, परिवार में इस तरह के उत्सव नवीनता लाते है। एक सी दिनचर्या से हुई नीरसता को खत्म कर उमंग, ऊर्जा स्फूर्ति देते है। कहा भी जाता है कि ‘परिवर्तन प्रकृति का नियम है’। यही छोटे बडे परिवर्तन हमें जीने का पाठ सिखाते हैं एवं नई ऊर्जा देते हैं। हर रिश्ते को नये सिरे से तरोताजा करते हैं। नववर्ष को और भी सकारात्मक रूप देने के लिये हम उसमें संकल्पों का धनात्मक नजरिया जोड दें तो हमें गणात्मक परिणाम मिलने की संभावनायें बढ जाती है। नारी रूपी धुरी पर परिवार रूपी पृथ्वी परिक्रमा लगाती है इस दशा में परिवार में नारी की भूमिका और भी सशक्त एवं महत्वपूर्ण हो जाती हैं वैसे भी शास्त्रों में भी नारी के महत्व को अनेक बार बखाना है ।
यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते ।
रमन्ते तत्र देवता ।।
अर्थात
जहां स्त्री की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है।
जैसी उक्तियों से हमें महिमा मंडित किया जाता रहा है। इसी महिमा मंडन को बरकरार रखने में एक सकारात्मक कदम पर ही हम यहां चर्चा करेंगें नववर्ष की सफलता के लिये कुछ न प्रयास हमें करने ही होते है। यदि हम कुछ संकल्प स्वयं के लिये और कुछ परिवार, समाज, देश और यदि हो सके विश्व के लिये कर उनका पालन भी करें तो सम्भवतः सर्व मंगल की आशा की जा सकती है। मेरे विचार से सिलसिलेवार कुछ मुख्य बिन्दु है
1. स्वयं सिद्ध बने : सबसे पहले प्रारंभ स्वयं से ही करना होगा। स्वयंसिद्वा बन अपने व्यक्तित्व में और भी निखार लाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठायें। अपने विचारों में से नकारात्मकता को कम करें। आधे खाली ग्लास के अपेक्षा आधे भरे ग्लास को ही देखें। औरों की बुराईयों को सुधारने की तथा अच्छाईयों को बढाने व अपनाने की पहल करें । परिवार में खुशहाली बनाये रखने के लिये प्यार सम्मान, प्रसंशा, त्याग, सहयोग, सामंजस्य, फटकार, उपहार, सेवा, क्षमा, जैसे मूल मंत्रों को अपनी जीवन शैली में समाहित अवश्यक करें। हर रिश्ते की सीमा तय करें सीमा बद्व जीवन में ही अनुशासन का मूल छिपा है। जो जीवन की अनेक कलाओं में से एक है।
2. स्वयं की गलतियों से सीखें : विद्वानों ने ठीक ही कहा है कि “Mistakes are committed by every body, repeated by fools & continued by bloody fools” गलती हर इन्सान से होती है. मूर्ख दोहराते है. और महामूर्ख लगातार गलती करते हैं। तो स्वयं को महामूर्ख व मूर्ख की श्रेणी में शामिल न होने दें। गतवर्ष में की गई गलतीयों को आगामी वर्ष में न दोहरायें और उन्हें सुधार कर लाभ लें।
3. आत्मविश्वास बढायें : आमतौर पर देखा गया है कि महिलायों में एक बहुत बड़ा प्रतिशत आज भी अपनके अधिकारों से अंजान, संकोची, एवं अज्ञानता में जी रहा है। आजादी के 7 दशक बाद भी स्थिति में बदलाव मंथर गति आ रही है। हमें गति तेज करने के साथ ही स्वयं के साथ दूसरों को बदलना है। आत्मविश्वास, स्वाललंबन, अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सजगता आदि मूल्यों के महत्व को पहचान कर अपनाना है। छोटा ही सही किन्तु ये महत्वपूर्ण योगदान होगा हमें भावी पीढ़ी को भी अपने अनुभव और ज्ञान की विरासत देना है।
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