प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए आचार संहिता

डा. कपूरमल जैन

प्रकृति और पर्यावरण को खतरा हमारे लालच और स्वार्थ से भरी गतिविधियों के कारण है। हमारे पास बुद्धि तो है लेकिन विवेक की कमी है। विवेक रहित मनोवृत्ति पर अड़े रहना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसे बदलना सबसे बड़ी चुनौती है। हमें भावी पीढ़ियों के बारे में सोचना है। यह हम प्रकृति-मित्र, वृक्ष-मित्र, जल-मित्र, वायु-मित्र और मृदा-मित्र बनकर कर सकते हैं। जरूरत दृढ़ संकल्प और ठोस कदम उठाने की है। हमारी पृथ्वी जैव विविधताओं और प्राकृक्तिक संसाधनों से भरपूर एक सुन्दर ग्रह है। लेकिन, आज पर्यावरण की गिरती गुणवत्ता और प्राकृतिक संसाधनों की घटती उपलब्धता के कारण गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। जैव विविधता को बचाए रखना हमारे लिए चुनौती बन गया है। जैव विविधता के सुरक्षित रहे बिना हमारा अपना अस्तित्व भी गहरे संकट में आ गया है। आज हमारी अवांछित पर्यावरण-विरोधी गतिविधियों और हस्तक्षेप के कारण धरती गरम होने लगी है। हवा और पानी जहरीले बन रहे हैं। प्राकृतिक चक्त गड़बड़ाने लगे हैं। इससे पृथ्वी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा है। जैव विविधता को लगातार पोषित करते रहना और इसे बचाए रख पाना संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में हमें स्वयं चेतने तथा व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर आगे आ कर कदम उठाने की आवश्यकता है। लेकिन हमारे सार्थक कदम तभी उठेंगे जब हम विचार करेंगे कि मालिकाना व्यवहार करते हुए हमने प्रकृति, वृक्ष, वायु, जल और मृदा आदि की गुणवत्ता का बहुत हास किया है। प्राकृक्तिक संसाधनों का शोषण की हद तक दोहन किया है। अतः हमें अपने नजरिए में बदलाव लाते हुए मित्रता का हाथ बढ़ाना होगा।

मित्रता की राह में बाधा
जब हम मित्र के रूप में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण या इनकी गुणवत्ता की रक्षा करने के लिए निकलते हैं तो हमारे सामने वे लोग आने लगते हैं जो जानकर सोए होते हैं या जिद्दी किस्म के होते हैं। हमें कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं, जो अत्यधिक स्वार्थी और लालची होते हैं। जिन्हें भावी पीढ़ियों की चिंता नहीं होती। इनके अलावा हमें वे लोग भी मिलते हैं जो अपने मन-विरुद्ध बात होने पर अपनी सारी भड़ास प्रकृति और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचाने में जरा भी संकोच नहीं करते। निश्चित ही ऐसे लोग संख्या-बल में कम होते हैं, लेकिन पर्यावरणी समस्या हल न होने देने में इनका बहुत अधिक योगदान होता है। ये लोग बेखौफ नदियों से रेत का खनन करते हैं। वन और खनिज सम्पदा लूटते हैं। खेतों में खड़ी फसलों और जंगलों को जलाते हैं। ये अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुँए को हवा में घोलते हैं तथा गंदे जल को नदियों में मिलाते हैं। इन लोगों की वजह से बिगड़ रहे हालात के कारण ही आज धरती के बुखार और जलवायु परिवर्तन, जैव-प्रजातियों के विलुप्तीकरण, पर्यावरणी गुणवत्ता के ह्रास से उपजे गहरे संकटों के पदचाप सुनाई देने लगे हैं। अतः ऐसे लोगों से प्रकृति और उसके घटकों को बचाना बड़ी चुनौती है।

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