“अरावली पर्वतमालाः संकट में प्रकृति की पुरानी ढाल”
-डॉ दीपक कोहली-
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन प्राकृतिक धरोहरों में से एक है। यह केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका इतिहास करोड़ों वर्षों पुराना है और यह केवल चट्टानों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की जीवनरेखा है। गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली यह पर्वतमाला मरुस्थलीकरण को रोकने, वर्षा के जल को संचित करने, जैव विविधता को संरक्षण देने और मानव जीवन को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। किंतु आज वही अरावली गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है, इसी कारण यह हाल के दिनों में चर्चा के केंद्र में है। यह चर्चा दरअसल हमारे विकास मॉडल, पर्यावरणीय नीतियों और भविष्य की चुनौतियों का आईना बन चुकी है।
अरावली पर्वत का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह थार मरुस्थल और गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक अवरोध का कार्य करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अरावली पर्वतमाला न होती, तो मरुस्थल का विस्तार बहुत पहले ही उत्तर भारत के बड़े हिस्से को प्रभावित कर चुका होता। आज जब राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण के संकेत दिखने लगे हैं, तब अरावली की भूमिका पर फिर से गंभीर विमर्श शुरू हुआ है।
हाल में अरावली के चर्चा में आने का एक प्रमुख कारण है, तेजी से होता इसका क्षरण। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और अवैध गतिविधियों ने अरावली को भीतर से खोखला कर दिया है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, अलवर, नीमराना और उदयपुर जैसे क्षेत्रों में पहाड़ों को काटकर सड़कें, कॉलोनियाँ और औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए। यह विकास देखने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अत्यंत चिंताजनक हैं।
अरावली पर्वत पर अवैध खनन लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। पत्थर, संगमरमर और अन्य खनिजों की अंधाधुंध खुदाई ने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को नष्ट कर दिया है। विस्फोटकों के प्रयोग से पहाड़ों को तोड़ा गया, जिससे न केवल भू-क्षरण बढ़ा, बल्कि आसपास के गाँवों में जलस्रोत भी सूखते चले गए। हाल में जब कई राज्यों में अवैध खनन के मामले सामने आए, तो प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायिक हस्तक्षेप के कारण अरावली फिर से सुर्खियों में आ गई।
जल संकट के संदर्भ में अरावली की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरावली क्षेत्र वर्षा जल संचयन का एक प्राकृतिक केंद्र रहा है। इसकी चट्टानें और वन क्षेत्र वर्षा के पानी को धीरे-धीरे भूजल में परिवर्तित करते हैं। जब जंगल कटते हैं और पहाड़ समतल कर दिए जाते हैं, तो वर्षा का जल बहकर निकल जाता है। यही कारण है कि दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के कई हिस्सों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है। हाल के जल संकटों ने अरावली के संरक्षण की आवश्यकता को फिर से उजागर किया है।
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